Meri Beti by Harsha Khanna

वह छोटी सी थी,उसे गुड़ियों से खेलना अच्छा लगता था।गुड़िया को सूंदर सूंदर कपडे पहनाना, सजाना,उसका ब्याह करना।

वह छोटी सी थी, उसे अच्छा लगता था घर घर खेलना। कभी वह माँ की साडी पहन लेती,दुल्हन बन जाती। कभी चुडिया पहनती,उनको खनखनाती।कभी पैरो में पायल पहन छम छम करती इतराती।

छोटी सी थी वह कभी कभी झूठमूठ की चाय बनाती घर में सबको पिलाती,कभी झूठमूठ की खीर बनाकर सबको खिलाती।

 

दिन गुजरते गये, वह बड़ी हुई सब सपने पूरे हुए। दुल्हन बनीं, सजी, चुडिया पहनी, पायल पहनी इतराई। एक दिन उसके घर एक छोटी सी बेटी आयी, एकदम गुड़िया जैसी,बिल्कुल परियों की शहज़ादी जैसी।

पर उस परी को देखते ही वो काँप उठी,डर गयी वो। उसे पति और सास का चेहरा याद आया।

सास की आवाज़ उसके कानों में गूंजी”अरे पगली,जाने दे इसे। हमें कान्हा चाहिये। जोगमाया का बलिदान तो देना ही होगा ना”

पर छोटी सी गुड़िया को देखकर उसे याद आया कि कैसे वो बचपन में अपनी गुड़िया किसी को छूने नहीं देती थी। कैसे अपने हाथों की मुट्ठी बनाकर मारती थी, जो भी उसकी गुड़िया को हाथ लगाता।

 

गुड़िया को देखकर वह बोली”तू जोगमाया नहीं बनेगी, तू बिजली कि तरह आकाश में नहीं उड़ेगी।तुझे में परियों की तरह रखूंगी। तू घर में सबकी आँखों का तारा होगी। ये वायदा है मेरा तुझसे।”

जैसे ही उसके पति और सास आये, उसने सास से कहा” देखो माँ, बिल्कुल आपकी छब्बी है। नैन नक़्श बिल्कुल आप जैसे है।”  पति ने बच्ची की तरफ देखा और बोला “अरे हाँ माँ इसके गाल पे आपके जैसे काला तिल हैं” सासुमां हैरान हो गयी बच्ची के गाल पे काला तिल देखकर। बच्ची को गोद् में लिया और बेटे से बोली” मेरी लक्ष्मी आ गयी, बेटा, मिठाई बँटवाओ, थाल बजवाओ” 

माँ ने अपनी गुड़िया को देखा, उसे लगा जैसे गुड़िया उसे आँख मार रही है।” 

 

हर्षा मुकुट खन्ना